नीलेशपुर का आसमान उस शाम कुछ ज़्यादा ही गुलाबी था। बारिश अभी-अभी थमी थी, गलियों में मिट्टी की खुशबू तैर रही थी और आम के पेड़ों से टपकती बूँदें जैसे किसी पुराने गीत की ताल पर गिर रही हों। उसी शहर में आरव लौटा था—कई साल बाद, अपनी पढ़ाई और नौकरी की आपाधापी से निकलकर। स्टेशन से निकलते ही उसने वही पुरानी सड़क पहचानी, वही चाय की दुकान, वही बेंच… और वही यादें।
उसी शहर में अनन्या रहती थी। अनन्या—जिसकी हँसी में झरने की सी ध्वनि थी और आँखों में अनकही कहानियाँ। कॉलेज के दिनों में दोनों अक्सर लाइब्रेरी की खिड़की के पास बैठते, किताबों के बीच आँखों-ही-आँखों में बातें करते। कभी-कभी हाथ टकरा जाते, और वही हल्की-सी छुअन पूरे दिन को खास बना देती।
आरव ने चाय की दुकान पर कदम रखा। दुकानदार ने पहचान लिया—“अरे, आरव! कब आए?”
“अभी-अभी,” आरव मुस्कुराया। उसकी निगाहें अनायास ही सामने वाले पार्क की ओर चली गईं। वहीं, बरगद के नीचे, अनन्या बैठी थी—बाल खुले, कंधों पर हल्की शॉल, हाथ में किताब। समय जैसे ठहर गया।
अनन्या ने नज़र उठाई। पल भर को उसे यक़ीन नहीं हुआ, फिर मुस्कान अपने-आप खिल गई। दोनों की आँखों में वही पुराना अपनापन लौट आया।
“कब आए?” उसने पूछा।
“अभी,” आरव ने वही जवाब दिया, और दोनों हँस पड़े—जैसे वर्षों का फ़ासला एक हँसी में पिघल गया हो।
वे पार्क में टहलने लगे। बातों का सिलसिला टूटा नहीं—काम, सपने, असफलताएँ, छोटे-छोटे सुख। बीच-बीच में चुप्पी भी आती, पर वह बोझिल नहीं थी; वह भरोसे की चुप्पी थी। बारिश की ठंडी हवा में अनन्या की शॉल फिसल गई। आरव ने सहजता से उठा दी। उनकी उँगलियाँ मिलीं—एक क्षण के लिए। दिल की धड़कनें तेज़ हुईं, पर शब्द नहीं मिले।
शाम गहराने लगी। लैंपपोस्ट जल उठे। अनन्या ने कहा, “घर चलो?”
आरव ने सिर हिलाया। उसका घर नदी के पास था—वही पुराना, जहाँ खिड़की से बहती धारा दिखती थी। रास्ते भर दोनों के कदम एक-दूसरे के साथ ताल में थे।
घर पहुँचकर अनन्या ने चाय बनाई। रसोई में इलायची की खुशबू फैल गई। चाय के प्यालों के साथ यादों की परतें खुलने लगीं।
“तुम्हें याद है,” अनन्या ने धीमे से कहा, “लाइब्रेरी की खिड़की?”
“हाँ,” आरव ने मुस्कुराते हुए कहा, “वहाँ से बारिश देखना।”
बारिश फिर शुरू हो गई। खिड़की पर बूँदें थपथपाने लगीं। कमरे में हल्की रोशनी थी, बाहर अँधेरा। दोनों खिड़की के पास खड़े हो गए। अनन्या की साँसें आरव के पास थीं—सुगंधित, शांत। उसने अनन्या की ओर देखा; उसकी आँखों में वही अपनापन था, पर अब उसमें साहस भी था।
आरव ने बहुत धीरे से कहा, “कुछ बातें समय से बाहर होती हैं… पर ख़त्म नहीं होतीं।”
अनन्या ने कुछ नहीं कहा। बस उसकी ओर एक क़दम बढ़ी। उनके बीच की दूरी मिट गई—इतनी कि धड़कनों की आवाज़ सुनाई देने लगी। आरव ने उसकी हथेली थामी—नर्म, गर्म। उस स्पर्श में वादा था, जल्दबाज़ी नहीं।
वे सोफ़े पर बैठे। बारिश का शोर बाहर था, भीतर एक शांत धुन। आरव ने अनन्या के बालों को कान के पीछे किया। उसकी आँखें झुक गईं। उस पल में शब्दों की ज़रूरत नहीं थी। एक हल्का-सा आलिंगन—सुरक्षित, स्नेह से भरा—जैसे दुनिया की हर थकान उतर गई हो।
रात बढ़ी। चाय ठंडी हो गई, पर कमरे की गर्माहट बनी रही। वे बात करते रहे—भविष्य की, छोटे शहर की, बड़े सपनों की। कभी हँसते, कभी चुप हो जाते। बाहर बारिश थम चुकी थी, पर भीतर एक नई शुरुआत की आहट थी।
काफी देर बाद अनन्या ने कहा, “कल नदी किनारे चलें?”
आरव ने हामी भरी। उसकी आँखों में उम्मीद चमकी।
अगली सुबह धूप साफ़ थी। नदी शांत बह रही थी। दोनों किनारे बैठे, पैर पानी में डाले। अनन्या ने कंकड़ उठाकर दूर फेंका। आरव ने देखा—उसकी हँसी अब और खुली थी।
“कभी-कभी,” आरव ने कहा, “घर लौटना आसान नहीं होता।”
“पर सही साथ हो,” अनन्या ने कहा, “तो सब आसान लगता है।”
उसने आरव का हाथ थाम लिया। इस बार किसी संकोच के बिना। धूप में उनकी परछाइयाँ एक-दूसरे से मिली हुई थीं। नदी आगे बढ़ रही थी—जैसे समय। पर उस पल में वे दोनों वहीं थे, पूरी तरह।
शाम को विदा का समय आया। स्टेशन पर ट्रेन सीटी देने लगी। अनन्या ने आरव को देखा—आँखों में भरोसा।
“जल्दी लौटना,” उसने कहा।
“लौटूँगा,” आरव ने कहा, “अब देर नहीं करूँगा।”
ट्रेन चली। खिड़की से शहर पीछे छूटता गया। आरव के दिल में एक सुकून था—जैसे कोई अधूरी पंक्ति पूरी हो गई हो। उसने जेब से वह पुरानी तस्वीर निकाली—लाइब्रेरी की खिड़की के पास की। मुस्कुराया।
नीलेशपुर में बारिश फिर आएगी, धूप भी। पर अब कहानियाँ अकेली नहीं थीं। दो दिलों ने एक-दूसरे को फिर से चुन लिया था—धीरे, सच्चे मन से। यही प्रेम था—नर्म, गहरा, और हमेशा के लिए।

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